
अमेरिका की खुफिया विभाग की तरफ से जारी सालाना रिपोर्ट ( यह रिपोर्ट संभावित अमेरिकी हितों के समक्ष उत्पन्न संभावित खतरों को लेकर होती है) में यह बात दोहराई गई है कि रूस भारत चीन की सदस्यता वाला संगठन ब्रिक्स की तरफ से डि-डॉलराइजेशन (अंतरराष्ट्रीय कारोबार में अमेरिकी डॉलर के इस्तेमाल को कम करने या खत्म करने की प्रक्रिया) की कोशिश की जा रही है।
ब्रिक्स कर रहा डि-डॉलराइजेशन की कोशिश: अमेरिका
विदेश मंत्रालय ने बताया है कि 24-25 मार्च, 2025 को भी ब्रिक्स संगठन के सदस्य देशों के बीच 10वीं नीतिगत योजना बैठक हुई है। बैठक ब्राजील में हुई जिसमें भारत, रूस, चीन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका के अलावा हाल ही में संगठन में शामिल नये सदस्य देशों के वरिष्ठ प्रतिनिधियों ने भी हिस्सा लिया है।
भविष्य को लेकर ब्रिक्स सदस्यों ने बनाई योजना
इसमें मुख्य तौर पर ब्रिक्स को एक संस्था के तौर पर विकसित करने के विषय पर विमर्श किया गया है। साथ ही हाल के विस्तार के बाद संगठन का भावी एजेंडा व प्राथमिकता क्या होनी चाहिए, इस पर भी विमर्श किया गया है। विदेश मंत्रालय के अलावा अंतरराष्ट्रीय कारोबार की मौजूदा स्थिति, आर्टिफिशिएल इंटेलीजेंस गवर्नेंस और बहुदेशीय शांति सुरक्षा फ्रेमवर्क में बदलाव जैसे दूसरे मुद्दे भी बैठक में उठे।
अमेरिका पर संभावित खतरे को लेकर जारी की गई रिपोर्ट
इन विषयों से संबंधित कुछ फैसले इस साल के शिखर सम्मेलन में होने की संभावना है। अमेरिका पर संभावित खतरे विषय पर तैयार रिपोर्ट तुसली गबार्ड के कार्यालय ने जारी की है। तुलसी गबार्ड अमेरिका की खुफिया एजेंसी की निदेशक हैं। हाल ही में गबार्ड ने भारत की यात्रा की थी।
बहरहाल, इस सालाना रिपोर्ट में रूस को अमेरिका के लिए सबसे बड़े खतरे के तौर पर चिन्हित किया गया है। इसके मुताबिक, “रूस की तरफ से पश्चिमी देशों की केंद्रीय भूमिका वाली अंतरराष्ट्रीय संगठनों जैसे संयुक्त राष्ट्र (यूएन) में गड़बड़ी फैलाने की कोशिश हो रही है।
ब्राजील, भारत, रूस, चीन और दक्षिण अफ्रीका की सदस्या वाला ब्रिक्स डि-डॉलरलाइजेशन की नीति को आगे बढ़ा रहे हैं।” वैसे पूरी रिपोर्ट में भारत के लिए एकमात्र अच्छी बात यह है कि इसमें लश्कर-ए-तैयबा जैसे भारत विरोधी आंतकी संगठन को अमेरिका के लिए भी खतरा के तौर पर चिन्हित किया गया है। संभव है कि इन संगठनों के खिलाफ अमेरिकी एजेंसी का दबाव आने वाले दिनों में और देखने को मिले।








