उमरअब्दुल्ला तलाक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने की टिप्पणी

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उमर अब्दुल्ला तलाक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने की टिप्पणी

जम्मू- कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के तलाक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि दोनों लोग एक साथ बैठकर अपने वैवाहिक विवादों को सुलझाने की कोशिश करें।

सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू- कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और अलग रह रही उनकी पत्नी पायल अब्दुल्ला को एक साथ बैठकर अपने वैवाहिक विवादों को सुलझाने की कोशिश करने का निर्देश दिया है। शीर्ष अदालत, नेशनल कॉन्फ्रेंस नेता की ओर से दायर तलाक के मामले की सुनवाई कर रही थी।

तीन हफ्ते का दिया समय

जस्टिस सुधांशु धूलिया और के विनोद चंद्रन की बेंच को सूचित किया गया कि दंपति के मामले में मध्यस्थता प्रक्रिया विफल रही है। कोर्ट ने कहा, “हालांकि, इस मामले में मध्यस्थता विफल हो गई है, लेकिन केवल एक और मौका देने के लिए पक्षों को एक साथ बैठकर अपने विवादों को सुलझाने की कोशिश करनी चाहिए। यह प्रयास तीन हफ्ते के भीतर किए जाएं।” यह आदेश 15 अप्रैल को पारित किया गया था।

7 मई को अगली सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने अगले सुनवाई की तारीख 7 मई तय की है। इससे पहले, अदालत ने पायल से उमर अब्दुल्ला की याचिका पर जवाब मांगा था।

क्या था हाई कोर्ट का आदेश?

दिल्ली हाई कोर्ट ने 12 दिसंबर 2023 को उमर अब्दुल्ला की तलाक याचिका को खारिज कर दिया था। अदालत ने कहा था कि याचिका में कोई दम नहीं है और 2016 के पारिवारिक न्यायालय के आदेश को बरकरार रखते हुए उमर के पक्ष में फैसला देने से इनकार कर दिया था।

1994 में हुई थी शादी

उमर अब्दुल्ला और पायल ने सितंबर 1994 में शादी की थी, लेकिन एक लंबी अवधि से वे अलग रह रहे हैं। इस जोड़े के दो बेटे- जाहिर और जमीर हैं। इससे पहले, हाई कोर्ट ने उमर अब्दुल्ला को अपनी पत्नी को 1.5 लाख रुपये प्रति माह और अपने दोनों बेटों को प्रत्येक को 60,000 रुपये प्रति माह भरण-पोषण के लिए देने का आदेश भी दिया था।

2011 में हुए थे अलग

उमर ने 2011 में पायल से अपनी अलगाव की घोषणा की थी, जिससे उनका 17 साल पुराना विवाह खत्म हो गया। उमर ने तलाक के लिए अर्जी दी थी, यह दावा करते हुए कि उन्हें क्रूरता का सामना करना पड़ा। हालांकि, पारिवारिक न्यायालय ने उनके आरोपों को अस्पष्ट और बिना प्रमाण के मानते हुए खारिज कर दिया। बाद में हाई कोर्ट ने इस मामले की पुनः समीक्षा की और पारिवारिक न्यायालय के निर्णय को बरकरार रखा, यह पाते हुए कि फैसले को पलटने का कोई कारण नहीं था।

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Author: Red Max Media

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