BPSC के नॉर्मेलाइजेशन में क्या अंतर है

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बिहार में पटना में नॉर्मलाइजेशन के खिलाफ BPSC ऑफिस के बाहर बीपीएससी अभ्यर्थियों ने प्रदर्शन किया. पुलिस ने लाठीचार्ज किया. इससे पहले उत्तर प्रदेश में भी यही मामला उठा था. आइए जान लेते हैं UPSC, UPPCS और BPSC के नॉर्मेलाइजेशन में क्या अंतर है, अभ्यर्थियों को इससे कितना फायदा और कितना नुकसान?
पिछले दिनों उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPPSC) ने पीसीएस प्रीलिम्स-2024 और RO/ARO-2023 की परीक्षा में नॉर्मेलाइलेशन सिस्टम लागू करने के लिए नोटिस जारी किया था. इसके बाद यूपी के अभ्यर्थी आंदोलन पर उतर आए थे. इसके कारण UP PCS परीक्षा एक ही दिन कराने का निर्णय लिया गया था. अब आरओ/ एआरओ परीक्षा भी एक ही दिन कराने की चर्चा हो रही है. इसी बीच, बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) का भी एक नोटिस लीक हो गया, जिसमें नॉर्मेलाइजेशन लागू करने की बात कही गई थी. इससे बिहार में भी अभ्यर्थी आंदोलन पर उतर आए हैं.
उधर, संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) भी केंद्रीय भर्ती की मुख्य परीक्षाओं में इसका इस्तेमाल करता है. आइए जान लेते हैं कि क्या है नॉर्मेलाइजेशन और अभ्यर्थियों को इसका कितना फायदा है और कितना नुकसान?
क्या है नॉर्मेलाइजेशन सिस्टम, कब लागू होता है
दरअसल, नॉर्मेलाइजेशन सिस्टम दो या इससे अधिक दिन या दो या इससे अधिक पालियों में होने वाली एक ही परीक्षा के लिए लागू किया जाता है. इसमें परीक्षा के बाद मूल्यांकन के लिए परसेंटाइल को आधार बनाया जाता है. एक दिन में होने वाली किसी प्रतियोगी परीक्षा में यह व्यवस्था लागू नहीं की जाती है.
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इससे कितना फायदा, कितना नुकसान?
कोई परीक्षा जब अलग-अलग दिन आयोजित की जाती है तो उसके लिए प्रश्नप्रत्र भी अलग-अलग बनाए जाते हैं. ऐसे में हर दिन होने वाली परीक्षा में सवाल भी अलग-अलग होते हैं. इसलिए इस बात की संभावना बढ़ जाती है कि कोई प्रश्न पत्र कठिन हो और कोई प्रश्न पत्र आसान. या यूं कहें कि हर पेपर के मुश्किल के स्तर में अंतर हो सकता है. इसी अंतर को समाप्त करने के लिए नॉर्मेलाइजेशन सिस्टम लागू किया जाता है. ऐसी ज्यादातर परीक्षा में परसेंटाइल स्कोर के आधार पर डिफिकल्टी के स्तर को एडजस्ट किया जाता है. जिससे किसी छात्र के साथ अन्याय न हो.
आसान पाली के अभ्यर्थियों के मुताबिक बढ़ाए जाते हैं अंक
दरअसल, अलग-अलग दिन या अलग-अलग पालियों में परीक्षा कराने का फैसला तब लिया जाता है, जह अभ्यर्थियों की संख्या बहुत ज्यादा होती है. इसमें नॉर्मेलाइजेशन लागू किया जाता है. इसका मतलब होता है कि जब किसी एक पाली में अभ्यर्थियों के कम अंक आए या कम सवालों के जवाब अभ्यर्थियों ने दिए, तो उस पाली के प्रश्न पत्र को कठिन माना जाएगा. वहीं, अगर किसी दूसरी पाली में अभ्यर्थियों के अधिक नंबर आए और उन्होंने सवालों के जवाब भी ज्यादा दिए तो उस पाली के प्रश्न पत्र को आसान माना जाएगा. ऐसे में नॉर्मलाइजेशन के तहत आसान पाली वाले अभ्यर्थियों के नंबर के हिसाब से मुश्किल पाली वाले अभ्यर्थियों के अंक भी बढ़ाए जाएंगे.
फायदे-नुकसान की गणना ऐसे कर रहे अभ्यर्थी
इसी नॉर्मेलाइजेशन व्यवस्था का अभ्यर्थी विरोध कर रहे हैं. उनका कहना है कि आयोग की परीक्षाओं में कई बार सवाल ही गलत पूछ लिए जाते हैं. अगर किसी एक पाली की तुलना में दूसरी पाली की परीक्षा में ज्यादा सवाल गलत हुए तो उनको कैसे पता चलेगा कि कितना अंक मिला. इसके अलावा परसेंटाइल निकालने का फॉर्मूला किसी एक पाली में परीक्षा में शामिल हुए छात्रों की संख्या के आधार पर निर्भर है. अगर किसी पाली में कम अभ्यर्थी शामिल हुए और उनके अंक भी कम आए तो स्वत: उस पाली की परीक्षा के प्रश्न पत्र को कठिन मान लिया जाएगा और उनके अंक बढ़ा दिए जाएंगे. ऐसे ही किसी पाली में अधिक अभ्यर्थी आए और प्रश्न पत्र कठिन होने के बावजूद अच्छे अंक आए तो भी उनको कोई लाभ नहीं मिलेगा.
योग्यता के निर्धारण पर उठ रहे सवाल

 

उनका एक तर्क यह भी है कि हो सकता है कि किसी पाली का प्रश्न पत्र कठिन हो पर उसमें शामिल किसी अभ्यर्थी को जवाब आते हैं, तो उसे अंक मिलेंगे ही. बाकी जिन लोगों को कठिन सवालों के जवाब नहीं आते, उनको भी अंक मिल जाएंगे. ऐसे में योग्यता का निर्धारण कैसे हो सकता है.
अभ्यर्थियों को यह भी डर सता रहा है कि इस व्यवस्था में ऐसा भी संभव है कि किसी एक पाली में परीक्षा देने वाले किसी अभ्यर्थी को अधिक अंक मिले हों, पर नॉर्मेलाइजेशन लागू होने से दूसरी पाली के अभ्यर्थियों के अंक कठिन प्रश्नपत्र के आधार पर बढ़ा दिए जाएं तो उसके अंक कम भी हो सकते हैं.
पुरानी व्यवस्था की मांग
अभ्यर्थियों का कहना है कि पहले एक दिन में सभी परीक्षाएं होती थीं और सबको एक जैसे प्रश्न पत्र मिलते थे. ऐसे में नॉर्मेलाइजेशन की कोई जरूरत ही नहीं पड़ती थी. जिसे जितने सवालों के जवाब आते थे, उसे उतने अंक हासिल होते थे. इसलिए अलग-अलग पालियों या अलग-अलग दिन एक ही परीक्षा कराने के बजाय एक दिन में परीक्षा कराई जाए. इससे सबको समान सवालों के जवाब देने को मिलेंगे और किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं होगा. योग्यता का निर्धारण भी आसानी से हो जाएगा.
दूसरी ओर, यूपीएसएससी ने तर्क दिया था कि नॉर्मेलाइजेशन की व्यवस्था देश के कई अलग-अलग भर्ती निकायों में लागू भी की जा चुकी है. इसे लागू करने से पहले विशेषज्ञों की टीम बनाई गई थी, जिसने पूरी व्यवस्था की समीक्षा की. इसके बाद परीक्षाओं के लिए नॉर्मेलाइजेशन का सिस्टम अपनाया गया. हालांकि, अभ्यर्थी इस तर्क को सुनने के लिए तैयार नहीं हैं.
यूपीएससी का नॉर्मेलाइजेशन सिस्टम
संघ लोक सेवा आयोग भी मुख्य परीक्षाएं अलग-अलग दिन कराता है. इसके नतीजों में नॉर्मेलाइजेशन का इस्तेमाल करता है. इसके तहत सभी अभ्यर्थियों के अंकों को इकट्ठा किया जाता है और उनका औसत निकाला जाता है. फिर हर अभ्यर्थी को मिले अंक की सभी अभ्यर्थियों को मिले औसत अंकों से तुलना की जाती है. इसके बाद हर अभ्यर्थी को मिले अंकों को सभी अभ्यर्थियों को मिले अंकों के अंतर के आधार पर नार्मेलाइज किया जाता है. इन नॉर्मेलाइज्ड अंकों को 100 प्वाइंट के स्केल में बदल दिया जाता है. इसी नॉर्मेलाइज्ड अंक के आधार पर उनकी रैंक तैयार की जाती है.
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Author: Red Max Media

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