
कैंब्रिज यूनिवर्सिटी की रिसर्च में खुलासा हुआ है कि ब्रिटिश राज के दौरान भी पंडितों ने गांवों और मठों में संस्कृत विद्या को जीवित रखा। उनकी वजह से यह परंपरा नष्ट नहीं हुई, जबकि ब्रिटिश शासन ने पारंपरिक शिक्षा प्रणाली बदल दी थी।
कैंब्रिज यूनिवर्सिटी की एक नई रिसर्च में संस्कृत को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। यूनिवर्सिटी की इस रिसर्च के मुताबिक, ब्रिटिश साम्राज्यवाद के दौर में जब भारत में अंग्रेजी हुकूमत का दबदबा बढ़ रहा था, तब भी संस्कृत की बौद्धिक परंपरा, साहित्य और कला को गांवों और मठों में बसे विद्वान पंडितों ने जिंदा रखा। इस रिसर्च का नेतृत्व कर रहे डॉ. जोनाथन डूक्वेट ने बताया कि सत्रहवीं सदी से ब्रिटिश उपनिवेशवाद के दौरान संस्कृत विद्या को नष्ट होने से बचाने में इन पंडितों का बड़ा योगदान रहा।
‘आज भारत में ज्यादातर लोग इन्हें भूल चुके हैं’
रिसर्च में सामने आया कि दक्षिण भारत के कावेरी डेल्टा में बसे ब्राह्मण बस्तियों (अग्रहार) और मठों में सैकड़ों विद्वान पंडित कविताएं, नाटक, दर्शन, धर्मशास्त्र और कानूनी ग्रंथ लिखते रहे। ये लोग उस दौर में भी अपनी विद्या को जीवित रखने में कामयाब रहे जब ब्रिटिश हुकूमत ने भारत की पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था को बदलना शुरू कर दिया था। डॉ. डूक्वेट, जो कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के फेकल्टी ऑफ एशियन एंड मिडिल ईस्टर्न स्टडीज और सेल्विन कॉलेज से जुड़े हैं, ने कहा, ‘इन पंडितों में कई साहित्यिक प्रतिभाएं थीं, जो इतिहास में अहम हैं, लेकिन आज भारत में ज्यादातर लोग इन्हें भूल चुके हैं।’
‘इनके काम और ग्रंथ लगभग गुमनाम हो चुके हैं’
डॉ. डूक्वेट ने कहा, ‘कुछ लोग आज भी इनका सम्मान करते हैं, लेकिन इनके काम और ग्रंथ लगभग गुमनाम हो चुके हैं। हम ऐसी रचनाओं का अध्ययन करेंगे जो कभी अनुवादित या छपी नहीं। शायद हमें ऐसे ग्रंथ भी मिलें, जिनका पश्चिमी विद्वानों ने कभी अध्ययन नहीं किया। हम यह भी पता लगाएंगे कि कौन से ग्रंथ कब और कहां लिखे गए।’ ऐतिहासिक तौर पर यह माना जाता रहा है कि ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने संस्कृत विद्या को धीरे-धीरे खत्म कर दिया। 1799 में जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने तंजावुर के राजदरबार पर कब्जा किया, जो संस्कृत विद्या का बड़ा केंद्र था, तब अंग्रेजी स्कूलों का प्रसार शुरू हुआ।
‘ग्रामीण बस्तियों और मठों ने संस्कृत को बचाए रखा’
पहले संस्कृत केवल उच्च वर्ग के ब्राह्मणों तक सीमित थी, जो वेद, दर्शन और साहित्य पढ़ने के लिए पारंपरिक स्कूलों में जाते थे। लेकिन 1799 के बाद, ब्राह्मण परिवार अपने बच्चों को पंडित बनाने के बजाय अंग्रेजी स्कूलों में भेजने लगे। डूक्वेट ने बताया, ‘इस बदलाव से संस्कृत विद्या जल्दी खत्म हो सकती थी, लेकिन ग्रामीण बस्तियों और मठों ने इसे बचाए रखा। इन बस्तियों की दूरदराज की लोकेशन और पंडितों को मिले स्थायी जमीन के अनुदान ने उनकी विद्या को सुरक्षित रखने में मदद की।’ यह धारणा कि संस्कृत केवल राजदरबारों और बड़े शहरों तक सीमित थी, गलत साबित हुई है।
‘तमिल विद्या के साथ था संस्कृत विद्या का तालमेल’
रिसर्च बताती है कि संस्कृत विद्या गांवों में भी फल-फूल रही थी और वहां तमिल विद्या के साथ इसका तालमेल भी था। डॉ. डूक्वेट की टीम 1650 से 1800 के बीच के समय पर ध्यान दे रही है और कावेरी डेल्टा में कम से कम 20 ऐसी बस्तियों की खोज कर रही है, जो बौद्धिक रूप से महत्वपूर्ण थीं। यह प्रोजेक्ट ऐसे समय में शुरू हुआ है जब कैंब्रिज यूनिवर्सिटी की फेकल्टी ऑफ एशियन एंड मिडिल ईस्टर्न स्टडीज संस्कृत और प्री-मॉडर्न इंडो-पर्सियन दुनिया के लिए रिसर्च और शिक्षण के लिए फंडिंग जुटाने की कोशिश कर रही है।
कैंब्रिज में 1867 से ही पढ़ाई जा रही है संस्कृत
कैंब्रिज में 1867 से संस्कृत अध्ययन की गौरवशाली परंपरा रही है और यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में संस्कृत के हस्तलिखित ग्रंथों का विश्व-प्रसिद्ध संग्रह मौजूद है।‘बियॉन्ड द कोर्ट’ नाम का यह प्रोजेक्ट, जिसका नेतृत्व डॉ. डूक्वेट कर रहे हैं, यूके की आर्ट्स एंड ह्यूमैनिटीज रिसर्च काउंसिल (AHRC) से फंडिंग प्राप्त कर रहा है। इस रिसर्च के जरिए न केवल संस्कृत विद्या के गुमनाम नायकों को दुनिया के सामने लाया जाएगा, बल्कि भारत की समृद्ध सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत को भी उजागर किया जाएगा।








