जम्मू कश्मीर में फिर शुरू हुई 153 साल पुरानी परंपरा

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उमर अब्दुल्ला

साल 2021 में उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के नेतृत्व वाले प्रशासन ने जम्मू कश्मीर से दरबार मूव की परंपरा खत्म कर दी थी। हालांकि, सीएम उमर अब्दुल्ला की पहल पर इसे दोबारा शुरू किया गया है।

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने जम्मू के लोगों से अपना वादा पूरा करते हुए गुरुवार को दरबार मूव की परंपरा दोबारा शुरू करने का आदेश दिया। केंद्र शासित प्रदेश में यह परंपरा 153 साल पहले शुरू हुई थी। हालांकि, 2021 में उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के नेतृत्व वाले प्रशासन ने इसे बंद कर दिया था। दरबार मूव की शुरुआत 1872 में डोगरा शासक महाराजा रणबीर सिंह के शासनकाल में हुई थी। पहाड़ी इलाकों में ठंड ज्यादा होती है, वहीं घाटी में गर्मी ज्यादा पड़ती है। मौसम की मार से बचने के लिए उन्होंने तय किया था कि गर्मी के समय में शाही दरबार पहाड़ों में लगेगा और ठंड के समय में दरबार कश्मीर में लगेगा। इसके बाद से यह परंपरा चली आ रही है।

जम्मू-कश्मीर में अपनी सरकार के एक साल पूरे होने के उपलक्ष्य में अब्दुल्ला ने संवाददाताओं से कहा, “आज मैंने व्यक्तिगत रूप से आधिकारिक फ़ाइल पर हस्ताक्षर किए हैं और मुझे उम्मीद है कि जल्द ही आदेश जारी हो जाएगा। हम दरबार मूव की पुरानी परंपरा को बहाल कर रहे हैं। हमने लोगों से वादा किया था कि हम दरबार मूव को बहाल करेंगे। मंत्रिमंडल ने इसकी बहाली के संबंध में निर्णय लिया है और इसे उपराज्यपाल को भेज दिया है। उपराज्यपाल ने हस्ताक्षर करके फाइल वापस कर दी है।”

साल में दो बार बदलती थी राजधानी

दरबार मूव की परंपरा के तहत सरकारी कार्यालय गर्मियों के महीनों में श्रीनगर से संचालित होते थे और सर्दियों में जम्मू में स्थानांतरित हो जाते थे। इस प्रक्रिया में लगभग 10,000 कर्मचारियों के साथ-साथ रिकॉर्ड, कंप्यूटर और फर्नीचर की आवाजाही शामिल थी और दर्जनों ट्रक साल में दो बार जम्मू-श्रीनगर राजमार्ग पर फाइलें और उपकरण लेकर आते थे। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर निशाना साधते हुए अब्दुल्ला ने कहा, “दरबार स्थानांतरण क्यों रोका गया? यह एक लंबे समय से चली आ रही परंपरा थी।”

सरकारी खजाने पर पड़ता था दबाव

अब्दुल्ला ने कहा, “जो लोग हम पर 1947 से पहले के जम्मू-कश्मीर के इतिहास को न समझने और इस क्षेत्र की महान हस्तियों का सम्मान न करने का आरोप लगाते थे। उन्हें बता दें कि भाजपा से ज्यादा किसी ने उनकी विरासत को नुकसान नहीं पहुंचाया है।” विपक्षी दल और व्यापारी वर्षों से दरबार स्थानांतरण की बहाली की पुरजोर वकालत कर रहे थे। जहां अधिकारी अक्सर मौसम की स्थिति और कर्मचारियों की सुविधा को इस परंपरा को जारी रखने का कारण बताते थे, वहीं आलोचकों ने इसे बोझिल और महंगा बताया, जिससे सरकारी खजाने से सालाना लगभग 200 करोड़ रुपये का नुकसान होता था।

अब्दुल्ला का चुनावी वादा पूरा

सिन्हा प्रशासन ने 2021 में तर्क दिया था कि इस प्रथा को समाप्त करके बचाए गए धन का उपयोग सार्वजनिक सेवाओं के लिए बेहतर ढंग से किया जा सकता है और अभिलेखों के डिजिटलीकरण ने भौतिक स्थानांतरण को अनावश्यक बना दिया है। अब्दुल्ला ने दिसंबर 2023 में घोषणा की थी कि अगर उनकी नेशनल कॉन्फ्रेंस सत्ता में लौटती है तो वह दरबार स्थानांतरण को बहाल करेगी। यह वादा अब पूरा हो गया है।

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Author: Red Max Media

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