पर्यावरण के नाम पर झूठ बेचनेवालों पर सख्ती

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प्रतीकात्मक तस्वीर

कोई भी कंपनी या सेवा एजेंसी अपने प्रोडक्ट को बिना प्रमाण के ईको फ्रेंडली आर्गेनिक कार्बन न्यूट्रल एवं पॉल्यूशन मुक्त होने का दावा नहीं कर सकेगी। दावे फर्जी पाए जाने पर सख्त कार्रवाई होगी। जुर्माना लगाया जा सकता है। उपभोक्ता मंत्रालय की सचिव निधि खरे ने ग्राहकों से आग्रह किया है कि मानकों के आधार पर ही किसी भी सामान की खरीदारी करें।

झूठ बोलकर उपभोक्ताओं को झांसा देने और पर्यावरण में पलीता लगाने वाले भ्रामक, असत्य एवं बेईमान दावों अथवा विज्ञापनों पर केंद्र सरकार सख्ती बरतने जा रही है। कोई भी कंपनी या सेवा एजेंसी अपने प्रोडक्ट को बिना प्रमाण के ईको फ्रेंडली, आर्गेनिक, कार्बन न्यूट्रल एवं पॉल्यूशन मुक्त होने का दावा नहीं कर सकेगी। दावे फर्जी पाए जाने पर सख्त कार्रवाई होगी। जुर्माना लगाया जा सकता है। हालांकि गाइडलाइन में यह स्पष्ट नहीं है कि हर्जाना का आकार क्या होगा और सख्त कार्रवाई कितनी सख्त होगी।

दावे फर्जी पाए जाने पर सख्त कार्रवाई होगी

उपभोक्ता मंत्रालय की सचिव निधि खरे ने ग्राहकों से आग्रह किया है कि मानकों के आधार पर ही किसी भी सामान की खरीदारी करें। केंद्र सरकार को हाल के दिनों में उपभोक्ता वस्तुओं के दावे से संबंधित कई शिकायतें प्राप्त हो रही थीं, जिसमें झूठे दावों (ग्रीनवाशिंग) की बात होती थी। शिकायतों की संख्या बढ़ने पर सचिव निधि खरे की अध्यक्षता में एक समिति बनाई गई, जिसमें शिक्षा से जुड़े विद्वान शामिल थे।

पर्यावरण संरक्षण से जुड़े दावे पर होगा चिंतन

देश के विभिन्न हिस्सों से आए सुझावों पर विमर्श करने के बाद समिति ने सिफारिशें दीं, जिसे कानूनी रूप दिया जा रहा है। इसका उद्देश्य खरीद-बिक्री व्यवहार पर विश्वास बढ़ाना है। यह तभी संभव होगा जब निर्माता कंपनियों द्वारा वैज्ञानिक साक्ष्य एवं प्रमाण के साथ पर्यावरण संरक्षण से संबंधित दावे किए जाएं।

स्पष्ट है कि अब किसी उत्पाद या पैकेट पर प्राकृतिक, जैविक एवं शुद्ध जैसे दावे सिर्फ हवा-हवाई नहीं होंगे, बल्कि ऐसे दावों का प्रमाण और पर्याप्त जानकारी देना जरूरी होगा। यह गाइडलाइन पर्यावरण के अनुकूल उत्पादों के विज्ञापन में ते•ाी से वृद्धि एवं उपभोक्ताओं में अति जागरूकता को देखते हुए तैयार की गई है। ”ग्रीनवाश” शब्द ‘व्हाइटवॉशिंग’ पर आधारित है।

लाभों का झूठा दावा करती हैं कंपनियां

अक्सर देखा जाता है कि कंपनियां अपने उत्पादों या सेवाओं के पर्यावरण के अनुकूल होने और उनसे मिलने वाले लाभों का झूठा दावा करती हैं या उनके बारे में बढ़ा-चढ़ाकर जानकारी देती हैं। इसी क्रम में प्राकृतिक, पर्यावरण के अनुकूल या हरा जैसी उपमाएं दी जाती हैं, जो पूरी तरह सच नहीं होते। कई बेईमान कंपनियां इसी तरीके से पर्यावरण संरक्षण का भ्रम पैदा कर उपभोक्ताओं को गुमराह करती हैं।

भ्रम फैलाने वाले शब्दों के इस्तेमाल से परहेज

दावों में संदर्भित पहलुओं (वस्तु, विनिर्माण प्रक्रिया, पैकेजिंग, आदि) को स्पष्ट रूप से बताना चाहिए।दिशानिर्देश के जरिए सरकार का उद्देश्य उपभोक्ताओं की आंखें खोलकर व्यापार जगत में उनकी पर्यावरण के प्रति वास्तविक जिम्मेदारी बढ़ाना है। साथ ही भ्रामक का मतलब प्रमाण के बिना ”पर्यावरण के अनुकूल”, ”हरित” और ”टिकाऊ” जैसे भ्रम फैलाने वाले शब्दों के इस्तेमाल से परहेज करना है।

 

 

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Author: Red Max Media

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