ऑस्ट्रेलिया का डे-नाइट टेस्ट में दबदबा.

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डे-नाइट टेस्ट के दौरान एक बार फिर अपनी बादशाहत दिखाई.
ऑस्ट्रेलिया की टीम ने एडिलेड में हुए डे-नाइट टेस्ट के दौरान एक बार फिर अपनी बादशाहत दिखाई. एकतरफा मुकाबले में उसने टीम इंडिया को 10 विकेट से हराया. इसके साथ ही उसने सीरीज में 1-1 से बराबरी की. अब 13 पिंक बॉल टेस्ट में उसके नाम 12 जीत हो चुकी है.

इंटरनेशनल क्रिकेट में डे-नाइट टेस्ट पिंक बॉल से खेला जाता है. गुलाबी गेंद आमतौर पर टेस्ट में लाल गेंद से खेले जाने वाले मैच से काफी अलग होती है, जो मुकाबले को खास बनाती है. इसमें ऑस्ट्रेलिया की टीम को बादशाह माना जाता है, जिसका सबूत एडिलेड में भी देखने को मिला. उसने एकतरफा मुकाबले में भारत को तीसरे ही दिन 10 विकेट से हरा दिया. ऑस्ट्रेलिया ने इसके साथ ही अपने 13वें डे-नाइट टेस्ट में 12वीं जीत दर्ज की. बता दें पिंक बॉल में सिर्फ वेस्टइंडीज की टीम ही एक बार ऑस्ट्रेलिया को हरा सकी है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर क्या कारण है कि डे-नाइट टेस्ट में ऑस्ट्रेलिया का इतना दबदबा रहता है?

ये है ऑस्ट्रेलिया की बादशाहत का कारण

पर्थ में हारने के बाद ऑस्ट्रेलिया दबाव में थी. लेकिन पैट कमिंस को पूरा भरोसा था कि उनकी टीम एडिलेड में वापसी करेगी. एडम गिलक्रिस्ट और माइकल क्लार्क जैसे पूर्व खिलाड़ियों ने भी भविष्यवाणी की थी कि मिचेल स्टार्क चमकेंगे, बल्लेबाज रन बनाएंगे और ऑस्ट्रेलिया ये मैच जीतकर सीरीज में बराबरी करेगी और वही हुआ. इस भरोसे के पीछे सबसे बड़ी वजह पिंक बॉल से खेलने का खिलाड़ियों का अनुभव था. वह हर सीजन में कम से कम एक पिंक बॉल-टेस्ट खेलती है.

इस गेंद से सबसे ज्यादा 13 मुकाबले ऑस्ट्रेलिया ने ही खेले हैं. इसके बाद इंग्लैंड ने 7, वेस्टइंडीज और भारत ने 5-5, पाकिस्तान, श्रीलंका और न्यूजीलैंड ने 4-4, साउथ अफ्रीका ने 2, बांग्लादेश और जिम्बाब्वे ने 1-1 पिंक बॉल टेस्ट खेले हैं. ऑस्ट्रेलिया और बाकी टीमों के बीच पिंक बॉल के अनुभव में अंतर साफ तौर पर देखा जा सकता है. इसलिए सबसे ज्यादा जीत उसके नाम है. इसके अलावा सबसे ज्यादा रन बनाने और सबसे ज्यादा विकेट लेने के मामले में सभी टॉप खिलाड़ी ऑस्ट्रेलिया के हैं.

घरेलू मैच में पिंक बॉल का इस्तेमाल

किसी भी कंडिशन में अच्छा प्रदर्शन के लिए जरूरी होता है कि खिलाड़ी उस कंडिशन में ढल जाए हैं. उसकी ज्यादा से ज्यादा तैयारी करें और यही काम ऑस्ट्रेलिया का बोर्ड अपने खिलाड़ियों से भी करवाता है. वह इंटरनेशनल क्रिकेट के अलावा अपने घरेलू फर्स्ट क्लास टूर्नामेंट शेफील्ड शील्ड में भी पिंक बॉल से मुकाबले करवाता है. इससे नेशनल टीम के साथ घरेलू खिलाड़ियों की भी इस गेंद से खेलने की ट्रेनिंग होती रहती है.

वह पहले से ही इस चैलेंज के लिए तैयार रहते हैं. इसका उदाहरण एडिलेड में भी देखने को मिला. इस सीरीज में डेब्यू करने वाले नाथन मैकस्वीनी पहली पारी के दौरान ज्यादा रन नहीं बना सके. लेकिन पहले दिन के तीसरे सेशन के दौरान रात में गुलाबी गेंद के खिलाफ उन्होंने विकेट को संभाल कर रखा. इसका फायदा ऑस्ट्रेलिया को अगले दिन मिला. उसने दिन में जमकर रन बटोरे.

घरेलू कंडिशन का फायदा

ऑस्ट्रेलिया की तैयारी के साथ उसे घरेलू कंडिशन का भी फायदा मिलता है. ऑस्ट्रेलिया में खेलना किसी भी टीम के मुश्किल होता है. वहीं पिंक बॉल इस मुश्किल को और भी बढ़ा देती है. विदेशी टीम के खिलाड़ी अपनी बैटिंग और बॉलिंग को लेकर ठीक से प्लानिंग कर पाते. भारतीय टीम करीब 2.5 साल के बाद पिंक बॉल से मैच खेल रही थी. वहीं ऑस्ट्रेलिया ने इसी साल वेस्टइंडीज के खिलाफ डे-नाइट टेस्ट खेला था.

इसके अलावा वह मात्र दूसरी बार एडिलेड में डे-नाइट टेस्ट के लिए उतरी थी. इसके पहले 4 में से 3 मैच भारत में खेले थे. दूसरी ओर ऑस्ट्रेलिया एडिलेड में 7 डे-नाइट टेस्ट खेल चुकी है. इसलिए ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाजों के मुकाबले ज्यादा स्विंग और सीम मूवमेंट मिलने के बावजूद भारतीय गेंदबाज समय पर विकेट नहीं चटका सके. उन्होंने पिंक बॉल के लिए जरूर लाइन और लेंथ पर गेंदबाजी नहीं की. दूसरी ओर कम मदद के बावजूद ऑस्ट्रेलिया ने भारत को दोनों पारियों में 200 के नीचे ढेर कर दिया. यानि पैट कमिंस की टीम ने अपने घरेलू कंडिशन और अनुभव का पूरा फायदा उठाया.

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Author: Red Max Media

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