
ISRO का स्पैडेक्स मिशन लॉन्च, अंतरिक्ष में फिर इतिहास रचेगा भारत; रूस, अमेरिका और चीन के बाद ऐसा करने वाला चौथा देश ।
इस मामले में बनेगा दुनिया का चौथा देश
स्पैडेक्स मिशन के साथ ही भारत डाकिंग और अनडाकिंग क्षमता प्रदर्शित करने का चौथा देश बनेगा। इस समय दुनिया में सिर्फ तीन देश- अमेरिका, रूस और चीन अंतरिक्षयान को अंतरिक्ष में डाक करने में सक्षम हैं। बता दें कि अंतरिक्षयान से दूसरे अंतरिक्षयान के जुड़ने को डाकिंग और अंतरिक्ष में जुड़े दो अंतरिक्ष यानों के अलग होने को अनडाकिंग कहते हैं।
बेहद महत्वपूर्ण है यह मिशन
- यह भविष्य के मानव अंतरिक्ष उड़ान के लिए महत्वपूर्ण तकनीक।
- अंतरिक्ष में डाकिंग के लिए यह किफायती प्रौद्योगिकी प्रदर्शन मिशन।
- चंद्रमा पर इंसान को भेजने, चांद से नमूने लाने के लिए आवश्यक।
- भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन का निर्माण और संचालन में भी होंगे आत्मनिर्भर।
- किसी मिशन के लिए एक से अधिक रॉकेट लांच करने पर भी होगी इस तकनीक की जरूरत।
किस तरह हासिल करेंगे सफलता
दो अंतरिक्षयान एसडीएक्स01 (चेजर) और अंतरिक्षयान एसडीएक्स02 (टारगेट) को ऐसी कक्षा में रखा जाएगा, जो उन्हें एक दूसरे से पांच किमी दूर रखेगी। बाद में इसरो मुख्यालय के विज्ञानी उन्हें तीन मीटर तक करीब लाने की कोशिश करेंगे, जिसके बाद उन्हें पृथ्वी से लगभग 470 किमी की ऊंचाई पर जोड़ा जाएगा। डाकिग की यह प्रक्रिया सोमवार को निर्धारित अंतरिक्षयानों के प्रक्षेपण के लगभग 10-14 दिन बाद जनवरी में होने की उम्मीद है।
दोनों अंतरिक्षयानों में होंगे पेलोड
एसडीएक्स 01 में हाई रिजॉल्यूशन कैमरा लगा है, जबकि एसडीएक्स 02 में दो पेलोड मिनिएचर मल्टीस्पेक्ट्रल पेलोड और रेडिएशन मॉनिटर पेलोड लगे हैं। ये पेलोड हाई रिजॉल्यूशन तस्वीरें, प्राकृतिक संसाधन निगरानी में मदद करेंगे। अंतरिक्षयान दो वर्षों तक पृथ्वी की परिक्रमा करेंगे।
‘सफलता की एक और कविता’ रचने की भी होगी काशिश
इस मिशन के साथ ही विज्ञानी पीओईएम-4 यानी पीएसएलवी ऑर्बिटल एक्सपेरिमेंटल मॉड्यूल-4 के तहत प्रयोग भी करेंगे। भारत तीन बार इस तरह का प्रयोग पहले भी कर चुका है। इन प्रयोगों के लिए पीएसएलवी-सी60 अपने साथ 24 पेलोड लेकर जा रहा है। इनमें 14 विभिन्न इसरो प्रयोगशालाओं से और 10 प्राइवेट विश्वविद्यालयों और स्टार्ट अप से संबंधित हैं।
अंतरिक्ष वातावरण में पालक के विकास का अध्ययन करने की योजना है। डेब्रिस कैप्चर रोबोटिक मैनिपुलेटर, अंतरिक्ष वातावरण में मलबे को कैप्चर करने की क्षमता प्रदर्शन करेगा। पहले इसरो ने पीएसएलवी सी-58 रॉकेट का इस्तेमाल कर पोएम-3 और पीएसएलवी-सी55 मिशन में पीओईएम-2 का उपयोग करके इसी तरह का सफल प्रयोग किया था।
अंतरिक्ष कचरे की समस्या से निपटने में भी मदद मिलेगी
इसरो के पीओईएम मिशन से अंतरिक्ष कचरे की समस्या से निपटने में भी मदद मिलेगी। दरअसल पीओईएम इसरो का प्रायोगिक मिशन है, इसके तहत कक्षीय प्लेटफॉर्म के रूप में पीएस4 चरण का उपयोग करके कक्षा में वैज्ञानिक प्रयोग किया जाता है। पीएसएलवी चार चरणों वाला रॉकेट है। इसके पहले तीन चरण प्रयोग होने के बाद समुद्र में गिर जाते हैं और अंतिम चरण उपग्रह को कक्षा में प्रक्षेपित करने के बाद अंतरिक्ष में कचरे/कबाड़ बन जाता है। पीओईएम के तहत रॉकेट के इसी चौथे चरण का इस्तेमाल वैज्ञानिक प्रयोग करने में किया जाएगा।








