उत्तराखंड में हरिद्वार और ऊधम सिंह नगर को छोड़कर बाकी जिलों में गैर प्रकाष्ठ वनोपज विकास और हर्बल टूरिज्म प्रोजेक्ट से 5000 वन पंचायतों को लाभ मिलेगा। इस योजना के तहत जड़ी-बूटियों का रोपण किया जाएगा। 628 करोड़ रुपये की लागत वाली यह योजना 2033 तक चलेगी। मुख्य सचिव ने जड़ी-बूटी उत्पादन को बढ़ावा देने के निर्देश दिए जिससे स्थानीय लोगों को फायदा होगा।
हरिद्वार व ऊधम सिंह नगर को छोड़कर राज्य के शेष जिलों में गैर प्रकाष्ठ वनोपज का विकास और हर्बल व एरोमा टूरिज्म प्रोजेक्ट के तहत 5000 वन पंचायतें लाभान्वित होंगी। इन वन पंचायतों के अंतर्गत पांच हजार हेक्टेयर के अलावा इतनी ही निजी भूमि पर जड़ी-बूटियों का रोपण किया जाएगा।
628 करोड़ रुपये की लागत वाली यह योजना वर्ष 2033 तक संचालित होगी। सोमवार को सचिवालय के सभागार में गैर प्रकाष्ठ वनोपज का विकास और हर्बल व अरोमा टूरिज्म प्रोजेक्ट की समीक्षा बैठक में मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन को वन विभाग की ओर से यह जानकारी दी गई।
मुख्य सचिव ने स्थानीय वन पंचायतों के क्लस्टर लेवल फेडरेशन के समन्वय से जड़ी-बूटी उत्पादन प्रोजेक्ट को मूर्त रूप देने के निर्देश दिए। मुख्य सचिव ने बैठक में राज्य में जड़ी-बूटी के विकास व संरक्षण से संबंधित कार्यों की जानकारी वन विभाग से ली।
उन्होंने निर्देश दिए कि स्थानीय समुदायों और वन पंचायतों को जड़ी-बूटी रोपण, ईको टूरिज्म एवं मूल्य संवर्द्धन गतिविधियों के माध्यम से सशक्त बनाया जाए। उन्होंने जड़ी-बूटी उत्पादन के माध्यम से आजीविका सृजन, कौशल विकास एवं स्थानीय आर्थिकी और बुनियादी ढांचे में सुधार को कदम उठाने के लिए भी निर्देशित किया।
उन्होंने यह भी निर्देश दिए कि प्रोजेक्ट के तहत चयनित की गई वन पंचायतों में कार्य को तेजी से आगे बढ़ाया जाए। बैठक में सचिव वन सी रविशंकर, वन विभाग के मुखिया डा धनंजय मोहन, अपर सचिव पर्यटन पूजा गब्र्याल, अपर सचिव वन विनीत कुमार, सीसीएफ इको टूरिज्म पीके पात्रो, सगंध पौधा केंद्र के निदेशक डा नृपेंद्र चौहान समेत अन्य अधिकारी उपस्थित रहे।
Author: Red Max Media
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